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पटना  : “आधी आबादी पर नजर, आसान होगी चुनावी डगर”…

संजय कुमार विनित… ✍️

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(वरिष्ठ पत्रकार सह राजनीतिक विश्लेषक)

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आहट तेज हो गई है , अक्टूबर सात – आठ तारीख तक चुनावी घोषणा की संभावना है। इस बीच आज सत्ता पक्ष ने चुनावी मैदान में एक ऐसा दांव चला है, जिसने पूरे सियासी समीकरण को नया मोड़ दे दिया है। आधी आबादी को साधने की नियत से ना कोई वादा, ना कोई दावा, बस एक क्लिक में ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत 75 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये ट्रांसफर किए गए। इसे नीतीश सरकार का बड़ा दांव माना जा रहा है, वहीं विपक्षी पार्टियों के लिए यह चुनौती माना जा रहा है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को संयुक्त रूप से ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ का शुभारंभ किया है। इस योजना के तहत बिहार की 75 लाख महिलाओं के बैंक खातों में शुक्रवार को पहली किस्त के रूप में 10-10 हजार रुपये की राशि सीधे ट्रांसफर कर दी गई। कुल मिलाकर 7500 करोड़ रुपये की यह रकम एक क्लिक में राज्य की आधी आबादी तक पहुंचाई गई। इससे प्रधानमंत्री श्री मोदी , जागरूक महिलाओं को संदेश देने में कामयाब हो गये कि आपके दो भाई नरेंद्र और नीतीश हैं और आपको कभी कोई दुख का सामना नही करना पडेगा। 

 

प्रधानमंत्री मोदी ने वर्चुअल संबोधन में कहा भी कि , “आपके दो भाई नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार आपकी सेवा में हमेशा हाजिर हैं। बहनों की खुशहाली ही भाइयों की असली खुशी है।” वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साफ किया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना एनडीए सरकार की प्राथमिकता है और कामकाज सही रहने पर 2 लाख रुपये तक अतिरिक्त मदद भी दी जाएगी। इस योजना की खूबियां की अगर बात करें तो हर लाभार्थी महिला के खाते में पहली किस्त के रूप में 10,000 रुपये, कामकाज अच्छा चलने पर 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त राशि, स्वयं सहायता समूहों के जरिए स्किल ट्रेनिंग और उद्यमिता को बढ़ावा, ग्रामीण बाजारों का विस्तार और छोटे व्यवसायों को मार्केट कनेक्ट का वादा है। 

बिहार की राजनीति में महिलाओं की भूमिका पिछले दो चुनावों से निर्णायक रही है। राज्य की मतदान आबादी का करीब 48 प्रतिशत हिस्सा महिलाएं हैं। खास बात यह है कि उन्होंने पुरुषों से अधिक मतदान कर अपनी राजनीतिक चेतना का परिचय दिया है। आंकड़ों में देखें तो 2020 के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी मतदान प्रतिशत के लिहाज से पुरुषों से कहीं ज्यादा रही। महिलाओं का मत प्रतिशत 63% और पुरुषों का 55%। यही वजह है कि इस बार चुनाव से पहले सरकार ने महिला वोट बैंक को साधने पर सीधा फोकस किया है। राजनीतिक विश्लेषणों के मुताबिक पिछले चुनावों में महिला वोटों का रुझान एनडीए और खासकर नीतीश कुमार के पक्ष में ज्यादा रहा है।इस बार भी यही सवाल चर्चा में है कि महिलाएं किसके पक्ष में भरोसा जताएंगी‌। 

चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खाते में इतनी बड़ी रकम सीधे ट्रांसफर करना महज़ कल्याणकारी कदम ही नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा भी माना जा रहा है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि महिलाओं को खुश करना मतलब पूरे परिवार को खुश करना, और यही किसी भी चुनाव में निर्णायक फैक्टर बन सकता है। विपक्ष इस योजना को चुनावी लालच बता सकता है, लेकिन महिलाओं तक सीधे कैश पहुंचना उनके लिए चुनौती है। आरजेडी और कांग्रेस पहले से ही रोजगार, आरक्षण और महंगाई के मुद्दों को भुनाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन 10-10 हजार की सीधी मदद ने उनके नैरेटिव को कमजोर कर दिया है।

नीतीश कुमार ने लंबे समय से महिलाओं को केंद्र में रखकर काम किये हैं, चाहे वह पंचायत में आरक्षण हो या नौकरियों में आरक्षण। इससे नीतीश कुमार ने स्थायी महिला वोट बैंक तैयार किया है। तेजस्वी यादव उसी वोट बैंक को खींचने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि चुनाव इस बार अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने महिलाओं के लिए ‘माई बहिन योजना’ जैसी योजनाओं के तहत 70,000 करोड़ रुपये की सौगात देने का वादा किया है।इसमें हर महिला को 2500 की सहायता, रसोई गैस सिलेंडर 500 में और विधवा पेंशन 1500 करने जैसे वादे शामिल हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए जो योजनाएं चलाई हैं, वह किसी भी वादे से कहीं अधिक ठोस हैं।उन्होंने पंचायत में 50% आरक्षण, शराबबंदी, साइकिल योजना, पोशाक योजना, ग्रेजुएशन तक 50,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि जैसी योजनाएं चलायी, जिससे महिला सशक्तिकरण को नई दिशा मिली है। विधवाओं को 1100 की मासिक पेंशन, महिलाओं को रोजगार में आरक्षण जैसी पहले नीतीश सरकार की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। जदयू प्रवक्ता का कहना है कि जब महागठबंधन की सरकार थी, तब महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ और राज्य अराजकता की ओर बढ़ा। 

नवरात्र के शुभ मौके पर लॉन्च की गई यह योजना सिर्फ़ आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान और राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करने का भी बड़ा संदेश है।अब देखना यह होगा कि खाते में आए 10-10 हजार रुपये महिलाओं को वाकई ‘लखपति दीदी’ बनने की राह पर ले जाएंगे या फिर यह महज़ चुनावी रणनीति साबित होगी।

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